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माया

                             --   प्रताप श्रेयस्

 अँधेरे में यदि रास्ते पर रस्सी पड़ी हो तो वह साँप होने का आभास देती है। जब प्रकाश की सहायता से उसे देखा जाता है तो साँप ओझल हो जाता है और रस्सी रह जाती है। श्री शंकराचार्य कहते हैं कि जिस प्रकार प्रकाश में देखने पर साँप गायब हो जाता है और रस्सी का होना शेष बचता है, उसी प्रकार उच्चतम ज्ञान के प्रकाश में देखने पर यह रस्सी भी गायब हो जायेगी और ब्रह्म शेष बचेगा। श्री शंकराचार्य बताते हैं कि जो शक्ति रस्सी को साँप दिखा रही थी वह भ्रम कहलाती है तथा जो शक्ति ब्रह्म को रस्सी  दिखा रही है वह माया कहलाती है। जिस प्रकार भ्रम का कारण एक अज्ञान था जो सामान्य प्रकाश के आने से दूर हो गया उसी प्रकार माया का कारण अविद्या है जो उच्चतम ज्ञान के आने से समाप्त हो जाती है।

 

शंकर अस्तित्त्व के तीन स्तर बताते हैं। पहला वह स्तर जिसपर परिस्थितियाँ सामान्य न होने पर कुछ का कुछ दिखाई पड़ता है, रस्सी का साँप दिखाई पड़ता है। यह भ्रम का स्तर है। शंकर इसे प्रातिभासिक स्तर कहते हैं। शंकर के अनुसार दूसरा स्तर वह है जहाँ जगत की सभी वस्तुएँ दिखाई पड़ती हैं। यह व्यवहारिक स्तर है। सभी सामान्य जन इसी व्यवहारिक स्तर पर जीते हैं। जिस प्रकार प्रकाश आदि के ज्ञान से भ्रम समाप्त हो जाता है उसी प्रकार ब्रह्मज्ञान से व्यवहारिक सत्ताएँ भी समाप्त हो जाती हैं। और तब जो शेष बचता है वही ब्रह्म है। देखने वाले के स्तर पर भी और वस्तु के स्तर पर भी। यहाँ महत्त्वपूर्ण यह है कि श्री शंकराचार्य के अनुसार ब्रह्म को जाना नहीं जा सकता है परन्तु ब्रह्म हुआ जा सकता है।

 

शंकर कहते हैं कि ब्रह्म को जानने में एक कॉन्ट्राडिक्शन आ जाता है। यदि कोई ब्रह्म को जानेगा तो दो सत्ताएँ हो जाएँगी – एक तो ब्रह्म और दूसरा ब्रह्म को जानने वाला। लेकिन सत्ता तो केवल ब्रह्म ही है अतः उसे जानने वाला उससे अलग कोई हो नहीं सकता। यही कारण है कि माया की अविद्या का नाश होते ही जीव का भौतिक रूप गिर जाता है और वह स्वयं ब्रह्म में लीन हो जाता है ब्रह्म हो जाता है।

 

पाठकों को यहाँ माया की अवधारणा समझने में थोड़ी सी कठिनाई हो सकती है। जो जगत सामने दिखाई देता है वह ज्ञान (अर्थात् ब्रह्मज्ञान) आने के बाद कहाँ चला जाएगा। यह जगत तो भौतिक पदार्थों का बना हुआ है तब फिर ज्ञान मात्र से यह नष्ट कैसे हो जाएगा। क्या वह ज्ञान (अर्थात् ब्रह्मज्ञान) कोई बहुत बड़ा थर्मोन्यूक्लियर डिवाइस (हाईड्रोजन बम) है जो एक ही बार में सब कुछ मटियामेट कर देगा। या वह ज्ञान एक्सपायरी डेट गुजर जाने के बाद बचा कोई सुरमा है जो आँख में पड़ते ही कुछ भी देख सकने का उपाय नहीं छोड़ेगा। क्या ज्ञानी (अर्थात् ब्रह्मज्ञानी) अन्धा हो जाएगा।

 

अब माया की इस अवधारणा को भी यदि कपिल मुनि के साँख्य दर्शन की दृष्टि से देखा जाए तो सुगमता बढ़ जाती है। साँख्य कहता है कि यह सारी प्रकृति तीन गुणों का मिश्रण है – सत्व, रजस् और तमस्। प्रलय के दौरान ये तीनों गुण अलग अलग साम्यवस्था में होते हैं और सृष्टि के समय, जब चेतन् तत्त्व ‘पुरुष’ प्रकृति के सम्पर्क में आता है तो इन तीनों गुणों में परस्पर मेलजोल शुरू होता है। इन तीनों गुणों के संयोजन से पहला तत्त्व बनता है – महत् अर्थात् बुद्धि। महत् अर्थात् बुद्धि से अहंकार (मैं, मेरा मुझे आदि के कारण) का विकास होता है। अहंकार से मन पैदा होता है। मन के विकास के बाद विकास क्रम में पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, नाक, कान, जिह्वा और त्वचा), पाँच कर्मेन्द्रियाँ (हाथ, पैर, जीभ, जननेन्द्रिय और मलद्वार) पाँच तन्मात्राएं (रूप, रस, गंध, शब्द और स्पर्श) और पाँच महाभूत ( पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश) पैदा होते हैं। उपरोक्त 24 तत्त्वों तथा 1 चेतन ‘पुरुष’ – इन 25 का संयोग ही सृष्टि है।

 

ध्यान से देखने पर पता चलता है कि प्रकृति और उससे बने 23 अन्य तत्त्व सब जड़ हैं। बुद्धि, अहंकार, मन, ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ सब कुछ जड़ प्रकृति से निकले हैं, सब कुछ जड़ है। बुद्धि विकल्प सोच देती है, अहंकार से अपनापन (ममत्त्व) पैदा होता है। मन मूल्याँकन करता है और चेष्टाएँ पैदा करता है। ज्ञानेन्द्रियाँ संवेदनाएँ इकट्ठी करती हैं। कर्मेन्द्रियाँ काम कर देती हैं। सोचने से लेकर संवेदनाएँ प्राप्त करने तक, ममत्त्व बोध से लेकर उपभोग करने तक हर एक चरण में प्रकृति ही प्रकृति है। इस जगत् में पदार्थों के लिये जो ललक दिखाई पड़ती है जो आकर्षण महसूस होता है वह असलियत में कुछ जड़ पदार्थों (मन, अहंकार और बुद्धि आदि) का अन्य जड़ पदार्थों (संसार की भौतिक वस्तुओं) से सामान्य जुड़ाव है। चेतना का इससे कोई लेना देना नहीं है। प्रकृति (मन, अहंकार और बुद्धिललक रही है, प्रकृति (पंच तन्मात्राओं और पंच महाभूतों) के लिये ललक रही है और प्रकृति (पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच कर्मेन्द्रियों) के ही सहारे उन्हें पाने में लगी हुयी है। सब चेष्टायें, विकार और प्राप्तियाँ सब प्रकृति में ही चल रहा है। इस सब में ‘पुरुष’ (अर्थात् चेतना) का कहीं कोई रोल ही नहीं है। ‘पुरुष’(चेतन् तत्त्व) कुछ नहीं करता है। करने के लिये जिन उपकरणों की जरूरत होती है वे ‘पुरुष’ के पास नहीं हैं। वे सब उपकरण प्रकृति के हैं और प्रकृति ही उन्हें इस्तेमाल करती है। चेतन् ‘पुरुष’ इस सबसे अलग है।  यह प्रकृति ही है जो बुद्धि, अहंकार और मन आदि अनेक रूपों में प्रकट हो रही है। प्रकृति एक है परन्तु अनेक दिखाई पड़ रही है। प्रकृति के इसी अनेक रूप स्वाँग को श्री शंकराचार्य ने माया कहा है।

 

प्रकृति के इस क्रियाव्यापार में जब तक ‘पुरुष’ स्वयं को कर्ता समझता रहता है वह माया के प्रभाव में रहता है और जब वह यह जान लेता है कि वह कर्ता नहीं है कर्ता तो प्रकृति है तो उसे ‘केवल ज्ञान’ प्राप्त हो जाता है। साँख्य के ‘केवल ज्ञान’ को ही शंकर ब्रह्मज्ञान कहते हैं। यह ब्रह्मज्ञान प्रकृति अर्थात् व्यवहारिक सत्ता की पोल खोल देता है। यह ‘पुरुष’ (चेतन) अर्थात् जीव को उसके अकर्ता 'स्वरूप' में स्थित कर देता है। जैसे ही जीव की अविद्या नष्ट होती है वह अपने मूल 'स्वरूप' ब्रह्म में ही लीन हो जाता है।

 

योगसूत्र में पातंजलि भी यही लिखते हैं – योगश्चितवृत्ति निरोधः। चित्त की वृत्तियों  का निरोध ही योग है (समाधिपाद – 2)। पातंजलि आगे कहते हैं – अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोध (.पा. – 12) अभ्यास और वैराग्य के द्वारा वृत्तियों का निरोध होता है। अगले सूत्र में उन्होंने यह भी बतलाया है कि अभ्यास क्या है। वे कहते हैं - तत्र स्थितौ यत्नोSभ्यासः (.पा. 13) अर्थात् ‘‘स्वरूप’’ में स्थिर होने के लिये जो प्रयत्न किया जाता है वही अभ्यास होता है। पातंजलि बता रहे हैं कि अभ्यास और वैराग्य द्वारा चित्त की वृत्तियों का निरोध करके 'स्वरूप' में स्थित हुआ जा सकता है। यह वही 'स्वरूप' है जहाँ साँख्य के ‘पुरुष’ को ‘केवल ज्ञान’ मिल जाता है और शंकर का जीव ब्रह्म में लीन हो जाता है।

 

गीता (6-2) भी यही कहती है कि योगी होने के लिये बुद्धि के संकल्पों से भी परे जाना पड़ता है। कृष्ण कहते हैं (गी. 3-27) कि सभी कर्म तो प्रकृति के गुणों द्वारा किये हुए हैं परन्तु अहंकारी मूढ़मति खुद को कर्ता मानते हैं। वह कहते हैं (गी. 18-17) कि अकर्ता भाव को प्राप्त पुरुष तो सब लोकों को मारकर भी पाप का भागी नहीं होता क्योंकि वह कर्म बंधन (अर्थात् माया) का अतिक्रमण कर चुका होता है। यह वही स्थिति है जहाँ कपिल मुनि के पुरुष को कैवल्य प्राप्त हो जाता है, पातंजलि का साधक अपने ‘स्वरूप’ में स्थित हो जाता है, शंकर का जीव, ब्रह्म में लीन हो जाता है। 

शंकर, कपिल, कृष्ण और पातंजलि सब एक ही आह्वान कर रहे हैं कि चेतन् को चेतना में ही स्थित होना चाहिये परन्तु वह जड़ पदार्थों से अपना एका (तादात्म्य) कर लेता है। यह गलत पहचान ही माया है।

 

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